शरीर की हर कोशिका के भीतर एक घड़ी होती है. ये घड़ियां कोशिकाओं के भीतर की रासायनिक प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं. हर कोशिका की घड़ी, शरीर की मास्टर क्लॉक से संचालित होती है. जो दिमाग़ में होती है.
इसे वैज्ञानिक एससीएन यानी सुप्राकियास्मैटिक न्यूक्लियस कहते हैं. ये सूरज की रौशनी, दिन के उतार-चढ़ाव के हिसाब से चलती है. शरीर की इन घड़ियों का काम होता है दिन की शारीरिक गतिविधियों के हिसाब से शरीर को तैयार करना और संचालित करना. शाम ढलने के बाद ये घड़ियां शरीर के अंगों को आराम करने का इशारा करती हैं. ताकि वो तरोताजा महसूस कर सकें.
जब हम दूसरे देशों की यात्रा पर जाते हैं, तो हमें जेटलैग हो जाता है. इसकी वजह ये होती है कि हमारे शरीर की क़ुदरती घड़ी की चाल गड़बड़ हो जाती है. वो स्थानीय समय के हिसाब से तालमेल बैठाने में दिक़्क़त महसूस करती है.
वैसे, दिमाग़ की घड़ी के गड़बड़ होने की वजह केवल रौशनी नहीं होती. जब हम बेवक़्त खाना खाते हैं, तो हमारे जिगर और खाना पचाने वाले अंगों की घड़ी का हिसाब-किताब भी गड़बड़ हो जाता है. इसके अलावा वर्ज़िश के वक़्त में बदलाव भी हमारी बॉडी क्लॉक पर असर डालता है.
जब हम अलग-अलग टाइम ज़ोन में सफ़र करते हैं, तो हमारे शरीर के अंग, बदलते वक़्त से तालमेल नहीं बिठा पाते. इसी तरह देर रात खाने से दिमाग़ में मौजूद घड़ी कनफ्यूज़ हो जाती है कि वो पाचन अंगों को क्या इशारा दे.
कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन पचाने की प्रक्रिया काफ़ी पेचीदा होती है. इसमें शरीर के कई अंगों का रोल होता है. जैसे जिगर, अग्न्याश्य, आंतें और प्लीहा. जब दिमाग़ की मास्टर क्लॉक ही कनफ्यूज़ हो, तो वो शरीर के दूसरे अंगों की घड़ियों को क्या निर्देश दे?
जो लोग लगातार कई दिनों तक पांच घंटे से कम सोते हैं, उनके ऊपर इंसुलिन हार्मोन का असर ख़त्म होने लगता है. इससे टाइप-2 डायबिटीज़ और दिल की बीमारियां होने लगती हैं. उनके पेट में जलन रहने लगती है.
जो लोग शिफ्ट में काम करते हैं, उनके साथ ये दिक़्क़त होने की आशंका ज़्यादा रहती है. यूरोप और उत्तर अमरीकी देशों में 15 से 30 फ़ीसद आबादी किसी न किसी पाली में काम करती है. इनके मोटे होने, डायबिटीज़ और डिप्रेशन के शिकार होने की आशंका बढ़ जाती है.
वैसे भी वर्किग डे और छुट्टी के दिन सोने-जागने का वक़्त अलग ही होता है. यानी की हमारा पाचन तंत्र भी खाना पचाने के लिए इस उठा-पटक से जूझता है.
तो, खाने का वक़्त बेहद अहम है. साथ ही महत्वपूर्ण ये भी है कि हम कब, कितना खाते हैं.
किंग्स कॉलेज लंदन की गेर्डा पॉट ने इस बारे में रिसर्च की है. गेर्डा कहती हैं उनकी दादी हमेशा तय वक़्त पर नाश्ता और खाना खाया करती थीं. नतीजा ये कि वो 90 साल के बाद भी सेहतमंद रहीं.
इंसुलिन हमारी सेहत के लिए बहुत अहम होता है. ये ग्लूकोज़ को पचाने और उससे ईंधन बनाने में मददगार होता है. जब हम देर से खाना खाते हैं, तो ग्लूकोज़ ज़्यादा देर तक हमारे शरीर में मौजूद होता है.
इसका नतीजा ये होता है कि इंसुलिन का असर ख़त्म होने लगता है. हमें डायबिटीज़ होने का डर बढ़ जाता है. शरीर में देर तक शुगर होने से शरीर के टिश्यू ख़राब होने लगते हैं. इससे अंधापन भी आ सकता है.
गेर्डा पॉट ने ब्रिटेन में 5000 हज़ार लोगों के 70 साल की सेहत का रिकॉर्ड खंगाला. उन्होंने पाया कि जो लोग नियमित रूप से समय पर खाना काते थे, उन्हें कम बीमारियां हुईं. जबकि बेवक़्त खाने वालों को डायबिटीज़ ज़्यादा होते देखा गया.
तो, हमें क्या करना चाहिए?
हमारी कोशिश ये होनी चाहिए कि हमारा खाने का वक़्त एक ही हो. या उसके आस-पास हो. सोने का वक़्त भी नियमित ही हो तो अच्छा होगा. जब हम सुबह उठ कर कमरे के पर्दे खोलते हैं, तो हमारे दिमाग़ को संकेत जाता है कि दिन शुरू हो गया है. इसके तुरंत बाद हम ब्रेकफास्ट कर लें, तो हमारे शरीर को काम शुरू करने का संकेत मिलेगा. इससे हमारे शरीर की घड़ी गड़बड़ नहीं होगी.
जो लोग सुबह नाश्ता नहीं करते, वो जब देर से खाते हैं, तो उनके शरीर में ग्लूकोज़ बहुत बढ़ जाता है.
खाने के अलावा हमें तय वक़्त पर ही सोने की कोशिश भी करनी चाहिए. सोने से पहले अगर हम बत्तियां बुझा कर अंधेरा कर लें, तो भी हमारे ज़हन को संकेत जाएगा कि आराम करने का वक़्त हो गया है. रोज़ाना सात से 8 घंटे की नींद लेने की कोशिश होनी चाहिए.
सचिन पांडा कहते हैं कि, 'इस धरती का हर जीव, सूरज के उगने और अस्त होने के हिसाब से 24 घंटे के साइकिल के हिसाब से विकसित हुआ है. इसकी बड़ी वजह ये है कि शरीर को रिपेयर और आराम करने के लिए रात में आराम की ज़रूरत होती है. दिन में जब शरीर पूरी तरह से सक्रिय होता है, तब वो आराम नहीं कर सकता.'
पांडा मिसाल देते हुए कहते हैं कि, 'आप किसी हाइवे की मरम्मत तब तो नहीं कर सकते जब उस पर ज़्यादा गाड़ियां चल रही हों.'
तो, बेहतर होगा कि हम पुरानी कहावत पर अमल करें. और, राजा की तरह नाश्ता करें, राजकुमार की तरह लंच और भिखारी की तरह रात का खाना लें.
इसे वैज्ञानिक एससीएन यानी सुप्राकियास्मैटिक न्यूक्लियस कहते हैं. ये सूरज की रौशनी, दिन के उतार-चढ़ाव के हिसाब से चलती है. शरीर की इन घड़ियों का काम होता है दिन की शारीरिक गतिविधियों के हिसाब से शरीर को तैयार करना और संचालित करना. शाम ढलने के बाद ये घड़ियां शरीर के अंगों को आराम करने का इशारा करती हैं. ताकि वो तरोताजा महसूस कर सकें.
जब हम दूसरे देशों की यात्रा पर जाते हैं, तो हमें जेटलैग हो जाता है. इसकी वजह ये होती है कि हमारे शरीर की क़ुदरती घड़ी की चाल गड़बड़ हो जाती है. वो स्थानीय समय के हिसाब से तालमेल बैठाने में दिक़्क़त महसूस करती है.
वैसे, दिमाग़ की घड़ी के गड़बड़ होने की वजह केवल रौशनी नहीं होती. जब हम बेवक़्त खाना खाते हैं, तो हमारे जिगर और खाना पचाने वाले अंगों की घड़ी का हिसाब-किताब भी गड़बड़ हो जाता है. इसके अलावा वर्ज़िश के वक़्त में बदलाव भी हमारी बॉडी क्लॉक पर असर डालता है.
जब हम अलग-अलग टाइम ज़ोन में सफ़र करते हैं, तो हमारे शरीर के अंग, बदलते वक़्त से तालमेल नहीं बिठा पाते. इसी तरह देर रात खाने से दिमाग़ में मौजूद घड़ी कनफ्यूज़ हो जाती है कि वो पाचन अंगों को क्या इशारा दे.
कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन पचाने की प्रक्रिया काफ़ी पेचीदा होती है. इसमें शरीर के कई अंगों का रोल होता है. जैसे जिगर, अग्न्याश्य, आंतें और प्लीहा. जब दिमाग़ की मास्टर क्लॉक ही कनफ्यूज़ हो, तो वो शरीर के दूसरे अंगों की घड़ियों को क्या निर्देश दे?
जो लोग लगातार कई दिनों तक पांच घंटे से कम सोते हैं, उनके ऊपर इंसुलिन हार्मोन का असर ख़त्म होने लगता है. इससे टाइप-2 डायबिटीज़ और दिल की बीमारियां होने लगती हैं. उनके पेट में जलन रहने लगती है.
जो लोग शिफ्ट में काम करते हैं, उनके साथ ये दिक़्क़त होने की आशंका ज़्यादा रहती है. यूरोप और उत्तर अमरीकी देशों में 15 से 30 फ़ीसद आबादी किसी न किसी पाली में काम करती है. इनके मोटे होने, डायबिटीज़ और डिप्रेशन के शिकार होने की आशंका बढ़ जाती है.
वैसे भी वर्किग डे और छुट्टी के दिन सोने-जागने का वक़्त अलग ही होता है. यानी की हमारा पाचन तंत्र भी खाना पचाने के लिए इस उठा-पटक से जूझता है.
तो, खाने का वक़्त बेहद अहम है. साथ ही महत्वपूर्ण ये भी है कि हम कब, कितना खाते हैं.
किंग्स कॉलेज लंदन की गेर्डा पॉट ने इस बारे में रिसर्च की है. गेर्डा कहती हैं उनकी दादी हमेशा तय वक़्त पर नाश्ता और खाना खाया करती थीं. नतीजा ये कि वो 90 साल के बाद भी सेहतमंद रहीं.
इंसुलिन हमारी सेहत के लिए बहुत अहम होता है. ये ग्लूकोज़ को पचाने और उससे ईंधन बनाने में मददगार होता है. जब हम देर से खाना खाते हैं, तो ग्लूकोज़ ज़्यादा देर तक हमारे शरीर में मौजूद होता है.
इसका नतीजा ये होता है कि इंसुलिन का असर ख़त्म होने लगता है. हमें डायबिटीज़ होने का डर बढ़ जाता है. शरीर में देर तक शुगर होने से शरीर के टिश्यू ख़राब होने लगते हैं. इससे अंधापन भी आ सकता है.
गेर्डा पॉट ने ब्रिटेन में 5000 हज़ार लोगों के 70 साल की सेहत का रिकॉर्ड खंगाला. उन्होंने पाया कि जो लोग नियमित रूप से समय पर खाना काते थे, उन्हें कम बीमारियां हुईं. जबकि बेवक़्त खाने वालों को डायबिटीज़ ज़्यादा होते देखा गया.
तो, हमें क्या करना चाहिए?
हमारी कोशिश ये होनी चाहिए कि हमारा खाने का वक़्त एक ही हो. या उसके आस-पास हो. सोने का वक़्त भी नियमित ही हो तो अच्छा होगा. जब हम सुबह उठ कर कमरे के पर्दे खोलते हैं, तो हमारे दिमाग़ को संकेत जाता है कि दिन शुरू हो गया है. इसके तुरंत बाद हम ब्रेकफास्ट कर लें, तो हमारे शरीर को काम शुरू करने का संकेत मिलेगा. इससे हमारे शरीर की घड़ी गड़बड़ नहीं होगी.
जो लोग सुबह नाश्ता नहीं करते, वो जब देर से खाते हैं, तो उनके शरीर में ग्लूकोज़ बहुत बढ़ जाता है.
खाने के अलावा हमें तय वक़्त पर ही सोने की कोशिश भी करनी चाहिए. सोने से पहले अगर हम बत्तियां बुझा कर अंधेरा कर लें, तो भी हमारे ज़हन को संकेत जाएगा कि आराम करने का वक़्त हो गया है. रोज़ाना सात से 8 घंटे की नींद लेने की कोशिश होनी चाहिए.
सचिन पांडा कहते हैं कि, 'इस धरती का हर जीव, सूरज के उगने और अस्त होने के हिसाब से 24 घंटे के साइकिल के हिसाब से विकसित हुआ है. इसकी बड़ी वजह ये है कि शरीर को रिपेयर और आराम करने के लिए रात में आराम की ज़रूरत होती है. दिन में जब शरीर पूरी तरह से सक्रिय होता है, तब वो आराम नहीं कर सकता.'
पांडा मिसाल देते हुए कहते हैं कि, 'आप किसी हाइवे की मरम्मत तब तो नहीं कर सकते जब उस पर ज़्यादा गाड़ियां चल रही हों.'
तो, बेहतर होगा कि हम पुरानी कहावत पर अमल करें. और, राजा की तरह नाश्ता करें, राजकुमार की तरह लंच और भिखारी की तरह रात का खाना लें.
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