Friday, September 14, 2018

कौन हैं वो मुसलमान जिनके दरबार में पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दाऊदी बोहरा समुदाय के मौजूदा सर्वोच्च धर्मगुरू सैय्यदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन इन दिनों अपने मध्य प्रदेश प्रवास के तहत इंदौर में हैं. वे छह सितंबर को इंदौर पहुंचे थे और 25 सितंबर तक वहां रहेंगे.
इस दौरान वे मोहर्रम के मौक़े पर वाज़ (प्रवचन) फ़रमाएंगे. मध्य प्रदेश सरकार ने सैय्यदना को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया है, लिहाज़ा स्थानीय प्रशासन और भाजपा शासित नगर निगम का पूरा अमला भी सैय्यदना की ख़िदमत में जुटा हुआ है.
चूंकि दो महीने बाद मध्य प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना है, लिहाज़ा ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सैय्यदना के 'दर्शन' के लिए शुक्रवार को इंदौर पहुंचे.
कांग्रेस का प्रादेशिक नेतृत्व भी राहुल गांधी को वहां ले जाने की कोशिश में जुटा है.
हालांकि वोटों के लिहाज़ से मध्य प्रदेश में बोहरा समुदाय की प्रभावी मौजूदगी महज़ तीन शहरों- इंदौर, उज्जैन और बुरहानपुर में ही है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के लिए बोहरा समुदाय की अहमियत उनके वोटों से ज़्यादा सैय्यदना से चुनावी चंदे के रूप में मिलने वाले नोटों की है.
कहा जाता है कि सैय्यदना अपने अनुयायियों से विभिन्न रूपों में जुटाई गई धनराशि में से इन दोनों पार्टियों को मोटी रक़म चुनावी चंदे के रूप में देते रहे हैं इसीलिए दोनों प्रमुख दलों के शीर्ष नेतृत्व का सैय्यदना की ख़िदमत में पेश होना कोई चौंकाने वाली बात नहीं है.
हालांकि सैय्यदना से पार्टियों को मिलने वाले चंदे का लेन-देन अघोषित तौर पर होता है. ख़ास बात यह है कि पहली बार कोई प्रधानमंत्री इस तरह बोहरा धर्मगुरू से मिलने पहुंचा. इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने सैय्यदना की ख़िदमत में इस तरह हाज़िरी नहीं बजाई.
अलबत्ता तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ज़रूर 1960 के दशक में गुजरात के सूरत शहर में दाऊदी बोहरा समुदाय के एक शिक्षा संस्थान का उद्घाटन करने गए थे, जहां 51वें सैय्यदना ताहिर सैफ़ुद्दीन से उनकी मुलाक़ात हुई थी. उस मुलाक़ात की तस्वीर को सैय्यदना और उनके निकटतम अनुयायी आज तक प्रचारित करते हैं.सरे धर्मगुरुओं के मुक़ाबले सैय्यदना का अपने समुदाय में एक अलग ही रुतबा है, एक तरह से वे अपने समुदाय के शासक हैं. मुंबई में अपने भव्य और विशाल आवास सैफ़ी महल में अपने विशाल कुनबे के साथ रहते हुए वे ख़ुद तो हर आधुनिक भौतिक सुविधाओं का उपयोग करते हैं, लेकिन अपने सामुदायिक अनुयायियों पर शासन करने के उनके तौर तरीक़े मध्ययुगीन राजाओं-नवाबों की तरह हैं.
उनकी नियुक्ति भी योग्यता के आधार पर या लोकतांत्रिक तरीक़े से नहीं, बल्कि वंशवादी व्यवस्था के तहत होती है, जो कि इस्लामी उसूलों के अनुरूप नहीं हैं.
सुधारवादी बोहरा आंदोलन के नेता इरफ़ान इंजीनियर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया था कि एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री होने के नाते उन्हें सैय्यदना जैसे 'विवादास्पद' धर्मगुरू के कार्यक्रम में शिरकत करने से बचना चाहिए. लेकिन ज़ाहिर है मोदी ने उनकी अपील ठुकरा दी.
दाऊदी बोहरा समुदाय की विरासत फ़ातिमी इमामों से जुड़ी है, जिन्हें पैगंबर हज़रत मोहम्मद (570-632) का वंशज माना जाता है. यह समुदाय मुख्य रूप से इमामों के प्रति ही अपना अक़ीदा (श्रद्धा) रखता है. दाऊदी बोहराओं के 21वें और अंतिम इमाम तैय्यब अबुल क़ासिम थे. उनके बाद 1132 से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू हो गई, जो दाई-अल-मुतलक़ सैय्यदना कहलाते हैं.
दाई-अल-मुतलक़ का मतलब होता है-सुपर अथॉरिटी यानी सर्वोच्च सत्ता, जिसके निज़ाम में कोई भी भीतरी या बाहरी शक्ति दख़ल नहीं दे सकती या जिसके आदेश-निर्देश को कहीं भी चुनौती नहीं दी जा सकती. सरकार या अदालत के समक्ष भी नहीं.
दाऊदी बोहरा समुदाय आम तौर पर पढा-लिखा, मेहनती, कारोबारी और समृद्ध होने के साथ ही आधुनिक जीवनशैली वाला है लेकिन साथ ही उन्हें धर्मभीरू समुदाय भी माना जाता है.
अपनी इसी धर्मभीरुता के चलते वह अपने धर्मगुरू के प्रति पूरी तरह समर्पित रहते हुए उनके हर 'उचित-अनुचित' आदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं.
मौजूदा सैय्यदना के परिवार के सदस्यों ने ही उनके सैय्यदना बनने को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दे रखी है. मौजूदा सैय्यदना मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन के पिता डॉ. मोहम्मद बुरहानुद्दीन 52वें सैय्यदना थे. परंपरा के मुताबिक़ उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी तय करना था लेकिन 2012 में अचानक गंभीर रूप से बीमार होकर कोमा में चले जाने की वजह से वे अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति नहीं कर पाए थे, लेकिन उन्होंने अपने छोटे भाई खुजेमा क़ुतुबुद्दीन को माजूम यानी अपना नायब बहुत पहले ही नियुक्त कर दिया था.
खुजेमा क़ुतुबुद्दीन के छोटे बेटे अब्दुल अली के मुताबिक़ डॉ. मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने 1965 में सैय्यदना का पद संभालने के महज़ 28 दिन बाद ही अपने भाई खुजेमा क़ुतुबुद्दीन को अपना माजूम नियुक्त कर दिया था. बताया जाता है कि अगर सैय्यदना औपचारिक तौर अपने उत्तराधिकारी के नाम का ऐलान किए बग़ैर ही इंतक़ाल फ़रमा जाते हैं तो ऐसी स्थिति में उनके माजूम को ही अगला सैय्यदना मान लिया जाता है लेकिन फ़रवरी 2014 में 52वें सैय्यदना डॉ. बुरहानुद्दीन की मौत के बाद ऐसा नहीं हुआ. उनके बेटे मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन ने अपने चाचा के दावे को नज़रअंदाज़ कर अपने पिता का उत्तराधिकार संभालते हुए ख़ुद को 53वां सैय्यदना घोषित कर दिया.

Tuesday, September 4, 2018

हरियाणा के उस नेता की कहानी, जो जनता के लिंग के पीछे पड़ गया था


क्या हरियाणा से कोई ऐसा नेता हुआ है, जिसे पूरा देश जानता हो?
हरियाणा से एक ऐसा नेता हुआ था, जो पुरुषों के लिंग के पीछे पड़ा था. उसे एक ऑर्डर मिला था और वो हर कीमत पर उसे पूरा करने पर आमादा था. उस नेता का नाम था बंसीलाल. आज उनकी बरसी है. बंसीलाल उस दौर के नेता थे, जब पूरे देश में कांग्रेस सिस्टम लगा हुआ था. केंद्र से लेकर तमाम राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी.
बंसीलाल का जन्म 26 अगस्त 1927 को भिवानी में हुआ था. जालंधर से उन्होंने लॉ की पढ़ाई की. फिर वकालत करने लगे. भिवानी में ही बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए. फिर हिसार में राजनीति से जुड़े. जिला कांग्रेस के प्रेसिडेंट बने. और तुरंत ही पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमिटी में आ गए. 1960 में राज्यसभा पहुंचे.
1966 में हरियाणा पंजाब से अलग होकर एक राज्य बन गया. बीडी शर्मा मुख्यमंत्री बने. ये मंत्रिमंडल पंजाब के नेताओं को लेकर ही बनाया गया था. फिर मार्च 1967 में हरियाणा में पहली बार चुनाव हुए. 1857 की क्रांति के नायकों में से एक राव तुलाराम के वंशज राव बिरेंदर सिंह पटौदी विधानसभा से चुनकर आए. ये द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान टेरिटोरियल आर्मी में नॉमिनेट हुए थे, सेंट स्टीफेंस से पढ़े थे. 1952 में निर्दलीय लड़े थे, पर हार गए थे. उसके बाद कांग्रेस में आ गए. फिर कद बढ़ा. पंजाब में प्रताप सिंह कैरों की सरकार में मंत्री बने थे.
पर 1967 में जीतते ही राव बिरेंदर सिंह ने अपनी अलग पार्टी बना ली. नाम रखा विशाल हरियाणा पार्टी. सरकार बना ली. कांग्रेस के कई विधायक इनके साथ आ गए. उस वक्त एंटी-डिफेक्शन लॉ नहीं था. लेकिन तब तक इंदिरा गांधी केंद्र में सत्ता में आ चुकी थीं. वहां गलती की गुंजाइश नहीं थी. सरकार गिरा दी गई और राष्ट्रपति शासन लग गया हरियाणा में. 1968 में फिर चुनाव हुए और अबकी कांग्रेस जीती. बंसीलाल मुख्यमंत्री बने. राव बिरेंदर सिंह की पार्टी दूसरे नंबर पर रही. बाद में राव ने भी कांग्रेस जॉइन कर लिया.
बंसीलाल 1968 से लेकर 1975 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे. नए राज्य हरियाणा में इंडस्ट्रियल और एग्रीकल्चरल विकास का श्रेय बंसीलाल को जाता है. हरियाणा के विद्युतीकरण की शुरुआत बंसीलाल ने ही की थी. पर तब तक केंद्र में स्थिति बदल गई. इंदिरा गांधी ने 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी. बंसीलाल इंदिरा गांधी के विश्वासपात्र माने जाते थे. जब मंत्री इंदिरा पर संदेह जताने लगे तो उन्होंने अपने सारे नजदीकियों को अपने पास बुला लिया. शुरुआत में बंसीलाल को बिना किसी विभाग का मंत्री बनाया गया. फिर उनको रक्षामंत्री का कार्यभार दे दिया गया.
पर बंसीलाल का काम अब शुरू हुआ. इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी उस वक्त पूरा मंत्रिमंडल ही चलाते थे. सारे फैसले वही लेते थे. बंसीलाल संजय के दोस्त थे.
संजय गांधी का मन पढ़ाई में नहीं लगता था. कई स्कूल घूमते हुए वो दून स्कूल पहुंचे. वहीं पर उनको कमलनाथ जैसा दोस्त मिला, जो दो साल लगातार फेल हुआ था. संजय की बचपन से ही मशीनों में रुचि थी. नेहरू कहते थे कि उनका नाती इंजीनियर बनेगा. संजय इंजीनियर तो नहीं बने, पर वो रॉल्स रॉयस में मैकेनिक का काम सीखने जरूर गए. वो भी छोड़कर आ गए. लेकिन कार बनाने का सपना नहीं छोड़ा. 1968 में ही संजय ने प्रस्ताव दिया था कि उनकी कंपनी केवल 6 हजार रुपये में ऐसी कार बनाएगी, जो 53 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी. उस बात पर जॉर्ज फर्नांडीज और मधु लिमये ने सरकार को खूब घेरा था. अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे करप्शन अनलिमिटेड कहा था. पर संजय ने अपने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा दिया. रुके नहीं. क्योंकि हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल ने डंडे के जोर से गुड़गांव के पास संजय की कंपनी मारुति को सैकड़ों एकड़ जमीन मुहैया करा दी.
फिर संजय गांधी 5 सूत्री काम लेकर आए. एडल्ट एजुकेशन, दहेज का खात्मा, पेड़ लगाना, परिवार नियोजन और जाति प्रथा उन्मूलन. सुनने में तो ये बड़े उद्देश्य लगते थे. पर काम करने का तरीका बर्बर था. इसमें सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना थी परिवार नियोजन. इसके लिए नसबंदी का सहारा लिया गया. बंसीलाल ने अपने दोस्त को समझाने की बजाय जी-जान से इस प्रोजेक्ट में हाथ बंटाया. गांव के गांव में पुलिस घुस जाती और मर्दों को पकड़कर उनकी नसबंदी करा दी जाती. बंसीलाल पर तो पुलिस को बाकायदा टारगेट देने के इल्जाम लगे थे. सच जो भी हो, बंसीलाल पर इसका इल्जाम तो लग ही गया.
में चुनाव हुए और बंसीलाल बुरी तरह हारे. विजेता चंद्रवती को 68 प्रतिशत और बंसीलाल को 29 प्रतिशत वोट मिले. पर दो साल में जनता पार्टी का हिसाब ही बदल गया. इंदिरा गांधी ने वापसी कर ली. कांग्रेस से नफरत खत्म हो गई थी. 1980 में बंसीलाल 41 प्रतिशत वोट के साथ जीत गए. चंद्रवती तीसरे नंबर पर रहीं. इसके बाद बंसीलाल केंद्र में आ गए. इस दौरान दूरदर्शन के लिए 8 रिले केंद्र बने, जिसमें से एक भिवानी में लगा. 1984 में बंसीलाल राजीव गांधी की सरकार में रेलमंत्री बने. भिवानी रेलवे स्टेशन को आधुनिक बनवा दिया.
फिर 1986-87 में उनको हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया गया. उसी साल वहां विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस बुरी तरह हारी. तोशम विधानसभा से बंसीलाल नजदीकी मुकाबले में एक नये लड़के धरमवीर से हार गए, जहां से वो जीत कर पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. 90 सीटों में से भाजपा-लोकदल के गठबंधन को 73 सीटें मिली थीं, जिसमें लोकदल की 58 थीं. कांग्रेस को 5 सीटें मिली थीं. जब देवीलाल ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ-ग्रहण किया तो उनके बाद सबसे ज्यादा तालियां धरमवीर के नाम पर ही बजी थीं. तोशम विधानसभा से ही एक साल पहले हुए उपचुनाव में बंसीलाल 92 प्रतिशत वोट से जीत कर मुख्यमंत्री बने थे.



लोकदल के देवीलाल ने रावी-व्यास नदियों और फजिल्का-आबोहार के मामले पर कांग्रेस को किनारे कर दिया था. ये झगड़ा इंदिरा गांधी के वक्त से चल रहा है और अभी तक नहीं सुलझा है. पर जिस मामले पर देवीलाल ने ट्रिपल सेंचुरी मारी, वो चंडीगढ़ का था. राजीव गांधी पंजाब के हरचरण सिंह लोंगोवाल से समझौता कर पंजाब एकॉर्ड का फॉर्मूला लेकर आए थे. जिसके मुताबिक चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाना था.
उधर कांग्रेसी नेताओं भजनलाल और बंसीलाल में आपसी खटपट हो गई थी. पर सामने कहते कि हम एक हैं. देवीलाल ने कह दिया कि किसानों के कर्जे वो माफ करा देंगे. तो ये दोनों लोग कहते कि देवीलाल के पास अधिकार ही नहीं हैं. देवीलाल ने कहा कि कानून बना दूंगा. और देवीलाल ने यहीं बाजी मार ली. कांग्रेस के नेता प्रचार करने कमांडो के साथ जाते. देवीलाल किसी गांव में पहुंच जाते. पानी मांगते, खाट पर बैठ जाते. और कहते, ‘मैं देवीलाल हूं.’ थके होते तो वहीं खाट पर सो भी जाते, झपकी मार लेते.
73 साल के बूढ़े देवीलाल बीमार चल रहे थे. उनका गरजना लोगों को भा गया. उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक दुश्मन भजनलाल और बंसीलाल से बदला ले लिया था.
चौधरी देवीलाल और भजनलाल का किस्सा इससे पुराना है. 1977 में कांग्रेस की हार के बाद हरियाणा में जनता पार्टी की तरफ से देवीलाल मुख्यमंत्री बने थे. भजनलाल इसी सरकार में मंत्री थे. 1979 में भजनलाल ने देवीलाल की सरकार गिरा दी. और अगले साल 40 विधायकों के साथ इंदिरा गांधी की कांग्रेस में आ गए. इंडिया टुडे के मुताबिक विधायकों को अपने कब्जे में करने की कोशिश में भजनलाल के लोग कमांडो की तरह जाते थे. वहीं देवीलाल ने अपने विधायकों को रोकने के लिए सबमशीनगन और राइफल का इंतजाम किया था. हजार एकड़ में फैले उनके किलेनुमा फॉर्महाउस में ये लोग रखे गए थे.
राजनीति का असली खेल हुआ 1982 में. हरियाणा में चुनाव हुए. 90 में से 35 सीटें कांग्रेस को मिलीं. लोकदल को 31 मिली थीं. 6 लोकदल की सहयोगी भाजपा को मिली थीं. कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन दोनों ने ही सरकार बनाने की दावेदारी रख दी. गठबंधन के नेता देवीलाल राज्यपाल के पास गए और अपनी दावेदारी पेश कर दी. पर उनके लौटने के तुरंत बाद ही राज्यपाल तपासे ने कांग्रेस के भजनलाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. जब चौधरी देवीलाल को इस बात का पता चला तो वो विधायकों को लेकर राजभवन पहुंचे. अपने समर्थक विधायकों की परेड भी करवाई. पर राज्यपाल नहीं माने.
तापसे 73 साल के थे. बीमार रहते थे, चिल्ला के बात नहीं कर सकते थे. इसी हंगामे के बीच उनका हाथ अपने आप ठुड्डी खुजाने के लिए उठा. देवीलाल ने उनका हाथ झटक दिया. और उनकी ठुड्डी पकड़कर बोले: तुम इंदिरा गांधी के चमचे हो. तुमको क्या लगता है कि ये करके तुम निकल जाओगे? ये सब इसलिए हुआ था कि जनता ने भजनलाल के 1979 के कारनामे को नहीं भुलाया था. पार्टी तोड़कर जाने वाले कई विधायक हारे थे. इसके बावजूद भजनलाल मुख्यमंत्री बन गए थे.